makadi ke jaale…………
मेरे बाल नही थे काले
ऐसे थे जैसे मकड़ी के जाले
छुआ भी नही कि उखर जाता था
भरी महफ़िल में गोरे तन पे बिखर जाता था
जूँ तो इतने जितने आकाश में तारे
बाल गिल भी लो जूँ गिन न पाओगे प्यारे
जब कभी बालो में जूँ दल हलचल मचाता था
दोनों हाथ उठाकर सर पर तेज़ी से हल चलाता था
रुसीयों ने सर का सारा जमीन हड़प लिया था
बालो कि एक दुर्दशा देखकर मै तड़प-तड़प गया था
देश के जांबाज शैंपू-सैनिकों से हमला करवाया
पर एक भी रूसी गुंडों ने अपना नाम तक नही बतलाया
उनके सफ़ेद करतूतों से तंग आकर
मुझको अपना सर मुरवाना पड़ा
जमाने से छुपे बेदाग़ चाँद को
दुनिया कि नजरों में लाना पड़ा
रूसी और जुओं ने तो अपने
पूर्वजों के घर से नाता तोड़ लिया
पर जमीन के इस चाँद का दर्शन करने
गली के बच्चो को मेरे पीछे छोड़ दिया
बच्चे इस युग में चाणक्य देखकर
खिल-खिलाकर हँस देते थे
जितने निक-नेम वर्षों में ना मिले थे
उतने मिनटों में कस देते थे
अब तो अपने बच्चे भी
मेरे सर को सड़क समझते थे
इधर से उधर खिलोने दौड़ाकर
आपस में खूब झगड़ते थे
गुस्से में आते ही बीवी
बेलन से तबला बजाती थी
गर प्यार भी कभी आता तो
गाल नही,सर को सहलाती थी
सबके व्यवहार से लगता था जैसे मै कोई बच्चा था
गलती कि मैंने चमन उजाड़ा
मै तो पहले ही अच्छा था
अब तो एक ही ख्वाइश थी
कब ये बंजर सर हरा होगा
अभी तो एक भी खड़ा नही है
कभी तो बाल बड़ा होगा
सात-आठ महीने बीत गए
पर अब भी सर का कागज़ कोरा था
अब तो ये भी भूल गया
कब कंघी करना छोड़ा था
हारकर डॉक्टर कि शरण गया तो
डॉक्टर ने कहा-
तुने अपने ही हाथो से
बालों कि बस्ती उजाड़ी है
शम्पुओं का एक्सेस प्रयोग कर
बालों की किस्मत बिगाडी है
अब तो शायद ही हरे-भरे हो
तेरे सर के बालों का खेत
इसिलिये तो कहा गया है
” अति सर्वत्र वर्जयेत “
बन्दर सा मुह लटकाकर
मै लौटने लगा घर
यही सोचकर कि जीवनभर
अब चमकता रहेगा मेरा सर………….