apne na rahe apne

अपनों को अपना समझते थे हम
फ़िर न जाने दिया क्यो अपनों ने सितम.
कोई शिकवा न थी अपनों से कभी.
न तोडी ही मैंने अपनों की कसम.
फ़िर ये कैसी जुदाई और ये कैसा वहम
गैरों  की तरह क्यो अपनों से जुदा हम.

माँ की परछाइयों को  भी पूजा है हमने
पैर पापा के हमने है  सर से सजाया ,
फ़िर न जाने हुआ कौन सा वो करम
बेदखल है आज माँ के मन्दिर से मेरे कदम .

हाथ भैया-भाभी का सर पे हमेशा से था
बन गया  फ़िर खुदा क्यो इस कदर बेरहम
आज काबिल नही है भरोसे के हम .

घर में आती थी खुशियाँ  आने  से मेरे
नाम से  भी मेरे  अब क्यो आ जाता है मातम

 

**************************************            – नीतेश मानव

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