sapno ki sougaat….
सपनो की सौगात लेकर
मेरी आँखे ढूंढ़ रही है,
उन रहो कों उन कदमो को,
आख़िर में जिसके मंजिल खड़ी है.
राहों में सागर है अथाह ,
पैरो के नीचे पत्थर है.
कई राह फूटती है राहों से ,
कदमो के भटकने का डर है.
कदमो से पत्थर उछालकर
उन सपनो में भी साँस भरेंगे
मेहनत के पर बांधकर हम,
उस सागर को भी पार करेंगे .
श्रम के श्रृंगार से
एक सच्ची राह सावारेंगे.
उन राहों पर चलते-चलते
हम एक दिन मंजिल पा लेंग॓
…………………………………………………………….. -नीतेश मानव
Comments
[...] sapno ki sougaat…. [...]
nitesh G very nice